जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर
बी.ए. भूगोल — भौतिक भूगोल
प्रकरण: Weathering and Denudation
(अपक्षय एवं अनाच्छादन)
1. भूमिका
पृथ्वी की सतह पर दो प्रकार की शक्तियाँ निरंतर कार्य करती है।
1. अंतर्जात शक्तियाँ (Endogenic Forces) — जो पृथ्वी की सतह पर उत्थान, पर्वत निर्माण तथा स्थलरूपों के निर्माण में सहायक होती हैं।
2. बहिर्जात शक्तियाँ (Exogenic Forces) — जो पृथ्वी की सतह पर स्थित ऊँचाइयों को कम करने तथा चट्टानों को तोड़ने, घिसने और हटाने का कार्य करती हैं।
बहिर्जात भू-आकृतिक प्रक्रियाओं में अपक्षय, बृहद् क्षरण/द्रव्यमान संचलन, अपरदन एवं परिवहन प्रमुख हैं। इन सभी प्रक्रियाओं को व्यापक अर्थ में अनाच्छादन (Denudation) कहा जाता है। 'Denude' का अर्थ है— ढकाव को हटाना या सतह को अनावृत करना।
भाग–I : अपक्षय (Weathering)
2. अपक्षय का अर्थ
अपक्षय वह प्रक्रिया है जिसमें पृथ्वी की सतह या उसके निकट स्थित चट्टानें वायुमंडल, जलवायु, जल तथा जैविक क्रियाओं के प्रभाव से अपने स्थान पर ही टूटती, बिखरती या रासायनिक रूप से विघटित होती हैं।
अर्थात्—
चट्टान → टूटना/विघटन → छोटे कण/मृदा
अपक्षय में पदार्थ का बड़े पैमाने पर परिवहन नहीं होता, इसलिए इसे यथास्थान प्रक्रिया (In-situ process) कहा जाता है।
«“वायुमंडलीय एवं जलवायवीय तत्वों के प्रभाव से चट्टानों का अपने स्थान पर यांत्रिक रूप से टूटना तथा रासायनिक रूप से विघटित होना अपक्षय कहलाता है।”»
3. अपक्षय की प्रमुख विशेषताएँ
1. यह मुख्यतः यथास्थान प्रक्रिया है।
2. इसमें चट्टानों का विघटन एवं अपघटन होता है।
3. इसमें परिवहन नगण्य या बहुत कम होता है।
4. तापमान एवं वर्षा इसके प्रमुख जलवायवीय नियंत्रक हैं।
5. चट्टान की संरचना एवं खनिज संघटन अपक्षय की दर को प्रभावित करते हैं।
6. यह मृदा निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
7. यह अपरदन एवं द्रव्यमान संचलन के लिए सामग्री तैयार करता है।
8. विभिन्न जलवायु प्रदेशों में अपक्षय की प्रकृति अलग-अलग होती है।
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4. अपक्षय के प्रकार
अपक्षय को मुख्यतः तीन भागों में बाँटा जाता है—
1. भौतिक या यांत्रिक अपक्षय
Physical / Mechanical Weathering
2. रासायनिक अपक्षय
Chemical Weathering
3. जैविक अपक्षय
Biological Weathering
व्यवहार में ये प्रक्रियाएँ एक-दूसरे से पूरी तरह अलग नहीं होतीं और कई क्षेत्रों में एक साथ कार्य करती हैं।
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5. भौतिक या यांत्रिक अपक्षय
जब चट्टान की रासायनिक संरचना में परिवर्तन किए बिना केवल उसका टूटना, बिखरना और छोटे-छोटे टुकड़ों में विभाजित होना होता है, तो उसे भौतिक अपक्षय कहते हैं।
प्रमुख कारण
- तापमान में परिवर्तन
- पाला एवं हिम का जमना
- दाब में परिवर्तन
- लवणों का क्रिस्टलीकरण
- गीला होना एवं सूखना
- गुरुत्वीय दबाव
NCERT के अनुसार यांत्रिक अपक्षय में तापीय प्रसार, दाब-मुक्ति, जल-दाब तथा क्रिस्टल वृद्धि जैसी शक्तियाँ महत्वपूर्ण हैं।
5.1 तापीय प्रसार एवं संकुचन
दिन और रात के तापमान में अधिक अंतर होने पर चट्टान बार-बार गर्म होकर फैलती तथा ठंडी होकर सिकुड़ती है।
इस निरंतर प्रसार एवं संकुचन से चट्टानों में तनाव उत्पन्न होता है और धीरे-धीरे वे टूटने लगती हैं।
अधिक प्रभाव वाले क्षेत्र
- गर्म एवं शुष्क मरुस्थल
- अर्द्ध-शुष्क क्षेत्र
- जहाँ दैनिक तापांतर अधिक हो
राजस्थान के मरुस्थलीय क्षेत्रों में यह प्रक्रिया विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
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5.2 परत-विच्छेदन या अपपत्रण
Exfoliation
जब चट्टान की बाहरी परतें अलग होकर प्याज के छिलके की तरह निकलने लगती हैं, तो इसे अपपत्रण कहते हैं।
इसके प्रमुख कारण हैं—
- तापीय प्रसार-संकुचन
- दाब-मुक्ति
- चट्टान के बाहरी भाग का अधिक प्रभावित होना
इसके परिणामस्वरूप Exfoliation Dome जैसे स्थलरूप विकसित हो सकते हैं।
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5.3 पाला क्रिया
Frost Action / Frost Wedging
ठंडे क्षेत्रों में चट्टानों की दरारों में पहुँचा हुआ पानी जमकर बर्फ बनता है।
जल → बर्फ → आयतन में वृद्धि → दरार पर दबाव → दरार का विस्तार → चट्टान का टूटना
बार-बार जमने और पिघलने से चट्टान टूटकर छोटे टुकड़ों में बदल जाती है।
प्रमुख क्षेत्र
- उच्च पर्वतीय क्षेत्र
- हिमालय
- ध्रुवीय एवं उपध्रुवीय क्षेत्र
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5.4 लवण अपक्षय
Salt Weathering
शुष्क एवं अर्द्ध-शुष्क क्षेत्रों में जल के वाष्पीकरण के बाद चट्टानों की दरारों में लवणों के क्रिस्टल जमा होते हैं।
क्रिस्टल के बढ़ने से चट्टान पर दबाव पड़ता है और चट्टान टूटने लगती है।
प्रमुख क्षेत्र
- मरुस्थल
- शुष्क पठार
- समुद्री तटीय क्षेत्र
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5.5 दाब-मुक्ति
Pressure Release / Unloading
गहरी चट्टानों के ऊपर स्थित भार या चट्टानी परतों के हटने से नीचे की चट्टानों पर दबाव कम हो जाता है।
दाब कम होने पर चट्टानें फैलती हैं और उनमें दरारें विकसित हो सकती हैं।
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6. रासायनिक अपक्षय
जब चट्टानों के खनिजों की रासायनिक संरचना में परिवर्तन होता है और वे घुलने, विघटित होने अथवा नए खनिजों में बदलने लगते हैं, तो इसे रासायनिक अपक्षय कहते हैं।
यह प्रक्रिया सामान्यतः उष्ण एवं आर्द्र जलवायु में अधिक प्रभावी होती है क्योंकि वहाँ जल और ऊष्मा पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होते हैं।
रासायनिक अपक्षय की प्रमुख प्रक्रियाएँ
1. विलयन
2. कार्बोनेशन
3. जलयोजन
4. ऑक्सीकरण
5. अपचयन
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6.1 विलयन
Solution
कुछ खनिज जल में सीधे घुल जाते हैं।
उदाहरण—
लवण + जल → विलयन
जल में घुलनशील खनिजों वाली चट्टानों पर यह प्रक्रिया विशेष प्रभाव डालती है।
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6.2 कार्बोनेशन
Carbonation
वर्षाजल जब वायुमंडल एवं मिट्टी से कार्बन डाइऑक्साइड ग्रहण करता है, तो उसमें हल्का कार्बोनिक अम्ल बन सकता है।
CO₂ + H₂O → H₂CO₃
यह अम्ल चूना-पत्थर जैसे कार्बोनेट खनिजों के विघटन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
इसी कारण चूना-पत्थर प्रदेशों में कार्स्ट स्थलाकृति के विकास में कार्बोनेशन महत्वपूर्ण है।
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6.3 जलयोजन
Hydration
जब किसी खनिज की संरचना में जल के अणु जुड़ जाते हैं तो उसके आयतन में वृद्धि और संरचनात्मक परिवर्तन हो सकता है।
इससे चट्टान कमजोर होकर टूटने लगती है।
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6.4 ऑक्सीकरण
Oxidation
जब चट्टानों में उपस्थित खनिज, विशेषकर लौहयुक्त खनिज, ऑक्सीजन के साथ प्रतिक्रिया करते हैं तो ऑक्सीकरण होता है।
उदाहरण:
लौह + ऑक्सीजन → लौह ऑक्साइड
इससे चट्टानों में लाल-भूरा रंग दिखाई दे सकता है।
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6.5 अपचयन
Reduction
जहाँ ऑक्सीजन की कमी होती है, विशेषकर जलसंतृप्त या जलभराव वाले क्षेत्रों में, वहाँ अपचयन की प्रक्रिया महत्वपूर्ण हो सकती है।
यह लौह जैसे तत्वों की रासायनिक अवस्था में परिवर्तन कर सकती है।
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7. जैविक अपक्षय
Biological Weathering
जीव-जंतु एवं वनस्पतियाँ चट्टानों के टूटने और विघटन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
प्रमुख कारक
- वृक्षों की जड़ें
- घास एवं वनस्पतियाँ
- केंचुए
- कृंतक
- जीव-जंतुओं की बिल बनाने की क्रिया
- जैविक अम्ल
- मृत वनस्पतियों एवं जीवों का अपघटन
उदाहरण
पेड़ की जड़ें चट्टान की दरारों में प्रवेश करके बढ़ती हैं। जड़ों के फैलने से दरार चौड़ी होती जाती है और अंततः चट्टान टूट सकती है।
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8. अपक्षय को प्रभावित करने वाले कारक
8.1 जलवायु
अपक्षय का सबसे महत्वपूर्ण नियंत्रक कारक जलवायु है।
- उष्ण एवं आर्द्र क्षेत्र → रासायनिक अपक्षय
- शुष्क क्षेत्र → भौतिक अपक्षय
- ठंडे पर्वतीय क्षेत्र → पाला क्रिया
तापमान एवं वर्षा अपक्षय की प्रकृति और तीव्रता को नियंत्रित करने वाले प्रमुख जलवायवीय तत्व हैं।
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8.2 चट्टान की प्रकृति
चट्टान की—
- कठोरता
- खनिज संरचना
- पारगम्यता
- संधियाँ
- दरारें
- स्तर विन्यास
अपक्षय की दर को प्रभावित करते हैं।
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8.3 स्थलाकृति
ढाल, ऊँचाई और सतह की स्थिति भी अपक्षय को प्रभावित करती है।
तीव्र ढाल वाले क्षेत्रों में अपक्षयित पदार्थ शीघ्र हट सकता है, जबकि कम ढाल वाले क्षेत्रों में अपक्षयित पदार्थ जमा होकर गहरी अपक्षय परत बना सकता है।
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8.4 वनस्पति
वनस्पति—
- जड़ों के द्वारा यांत्रिक अपक्षय बढ़ाती है।
- जैविक अम्लों द्वारा रासायनिक अपक्षय में सहायता करती है।
- मिट्टी में नमी बनाए रखती है।
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8.5 समय
अपक्षय एक क्रमिक प्रक्रिया है। लंबे समय तक चट्टान पर अपक्षयी प्रक्रियाएँ कार्य करने पर गहरी अपक्षयित परत विकसित हो सकती है।
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9. अपक्षय का भौगोलिक महत्व
1. मृदा निर्माण
अपक्षय चट्टानों को छोटे कणों में बदलकर मृदा निर्माण के लिए आधार प्रदान करता है।
2. अपरदन में सहायता
अपक्षय चट्टानों को कमजोर और ढीला करता है, जिससे अपरदन आसान हो जाता है।
3. द्रव्यमान संचलन में सहायता
अपक्षयित चट्टानी पदार्थ ढाल पर गुरुत्व के प्रभाव से नीचे की ओर आसानी से खिसक सकता है।
4. स्थलरूप निर्माण
अपक्षय विभिन्न विशिष्ट स्थलरूपों के विकास में योगदान देता है।
5. खनिज संसाधनों का निर्माण
अपक्षय कुछ क्षेत्रों में लौह, मैंगनीज, बॉक्साइट आदि खनिजों के सांद्रण एवं समृद्धि में योगदान कर सकता है।
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भाग–II : अनाच्छादन
Denudation
10. अनाच्छादन का अर्थ
‘Denudation’ शब्द लैटिन मूल के Denudare से संबंधित है, जिसका अर्थ है—
ढकाव हटाना / अनावृत करना / सतह को नग्न करना।
भू-आकृति विज्ञान में अनाच्छादन वह व्यापक प्रक्रिया है जिसके द्वारा पृथ्वी की सतह का पदार्थ टूटता, ढीला होता, हटता और एक स्थान से दूसरे स्थान तक स्थानांतरित होता है।
NCERT के अनुसार अनाच्छादन के अंतर्गत अपक्षय, द्रव्यमान संचलन, अपरदन एवं परिवहन जैसी बहिर्जात प्रक्रियाएँ आती हैं।
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11. अनाच्छादन की प्रमुख प्रक्रियाएँ
अनाच्छादन
↓
अपक्षय (Weathering)
↓
चट्टानों का यथास्थान टूटना/विघटन
↓
द्रव्यमान संचलन (Mass Movement)
↓
गुरुत्व के कारण पदार्थ का ढाल के नीचे जाना
↓
अपरदन (Erosion)
↓
जल, वायु, हिमनद, समुद्री तरंग आदि द्वारा पदार्थ को काटना और हटाना
↓
परिवहन (Transportation)
↓
अवसादों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाना
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12. द्रव्यमान संचलन
Mass Movement
जब चट्टानी पदार्थ या मिट्टी गुरुत्वाकर्षण के प्रत्यक्ष प्रभाव से ढाल की दिशा में नीचे की ओर गति करती है, तो इसे द्रव्यमान संचलन कहते हैं।
प्रमुख प्रकार
1. मृदा विसर्पण — Soil Creep
2. सोलिफ्लक्शन — Solifluction
3. भूस्खलन — Landslide
4. मलबा प्रवाह — Debris Flow
5. मडफ्लो — Mudflow
6. शैलपात — Rock Fall
इसमें मुख्य प्रेरक शक्ति गुरुत्वाकर्षण होती है।
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13. अपरदन
Erosion
अपरदन वह प्रक्रिया है जिसमें अपक्षयित अथवा अन्य चट्टानी पदार्थों को जल, पवन, हिमनद, भूमिगत जल तथा समुद्री तरंगों जैसे भू-आकृतिक अभिकर्ताओं द्वारा काटकर हटाया और स्थानांतरित किया जाता है।
प्रमुख अपरदनकारी अभिकर्ता
- बहता हुआ जल
- भूमिगत जल
- हिमनद
- पवन
- समुद्री तरंगें
अपरदन पृथ्वी की सतह के उच्चावच को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
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14. अपक्षय और अपरदन में अंतर
आधार| अपक्षय| अपरदन
अर्थ| चट्टानों का टूटना/विघटन| पदार्थ का काटना एवं हटाना
स्थान| मुख्यतः यथास्थान| एक स्थान से दूसरे स्थान तक
परिवहन| नगण्य| महत्वपूर्ण
प्रमुख कारण| तापमान, जल, रासायनिक क्रियाएँ, जीव| जल, पवन, हिमनद, तरंगें आदि
प्रकृति| तैयारी की प्रक्रिया| हटाने एवं परिवहन की प्रक्रिया
परिणाम| चट्टान कमजोर होती है| स्थलरूप का क्षरण होता है
महत्वपूर्ण: अपक्षय और अपरदन समान नहीं हैं। अपक्षय पदार्थ को तैयार करता है, जबकि अपरदन उसे हटाता एवं परिवहन करता है।
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15. अपक्षय और अनाच्छादन में अंतर
आधार| अपक्षय| अनाच्छादन
प्रकृति| विशिष्ट प्रक्रिया| व्यापक अवधारणा
मुख्य कार्य| चट्टानों का विघटन/अपघटन| सतह से पदार्थ का हटना
परिवहन| सामान्यतः नहीं| कई प्रक्रियाओं में होता है
प्रमुख प्रकार| भौतिक, रासायनिक, जैविक| अपक्षय, द्रव्यमान संचलन, अपरदन, परिवहन
प्रमुख परिणाम| अपक्षयित पदार्थ का निर्माण| स्थलरूपों का निम्नीकरण
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16. जलवायु और अनाच्छादन का संबंध
जलवायु अनाच्छादन प्रक्रियाओं को नियंत्रित करने वाला प्रमुख कारक है।
उष्ण एवं आर्द्र प्रदेश
रासायनिक अपक्षय तीव्र होता है।
उष्ण एवं शुष्क प्रदेश
तापीय प्रसार, लवण अपक्षय और अन्य भौतिक प्रक्रियाएँ अधिक प्रभावी होती हैं।
ठंडे प्रदेश
हिम एवं पाला क्रिया महत्वपूर्ण होती है।
पर्वतीय प्रदेश
ढाल, गुरुत्व, हिम तथा जल मिलकर द्रव्यमान संचलन और अपरदन को प्रभावित करते हैं।
जलवायु में भिन्नता के कारण विभिन्न क्षेत्रों में बहिर्जात प्रक्रियाओं की प्रकृति और तीव्रता अलग-अलग होती है।
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17. परीक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बिंदु
एक अंक/अति लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न: अपक्षय क्या है?
उत्तर: चट्टानों का अपने स्थान पर यांत्रिक रूप से टूटना तथा रासायनिक रूप से विघटित होना अपक्षय है।
प्रश्न: अपक्षय किस प्रकार की प्रक्रिया है?
उत्तर: मुख्यतः यथास्थान प्रक्रिया।
प्रश्न: अपक्षय के तीन प्रमुख प्रकार कौन-से हैं?
उत्तर: भौतिक, रासायनिक और जैविक।
प्रश्न: कार्बोनेशन किस प्रकार का अपक्षय है?
उत्तर: रासायनिक अपक्षय।
प्रश्न: पाला क्रिया किस प्रकार का अपक्षय है?
उत्तर: भौतिक/यांत्रिक अपक्षय।
प्रश्न: अनाच्छादन का अर्थ क्या है?
उत्तर: पृथ्वी की सतह से पदार्थ एवं आवरण को हटाने की व्यापक बहिर्जात प्रक्रिया।
प्रश्न: द्रव्यमान संचलन की प्रमुख प्रेरक शक्ति क्या है?
उत्तर: गुरुत्वाकर्षण।
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18. दीर्घ उत्तरीय परीक्षा प्रश्न
प्रश्न 1.
अपक्षय की परिभाषा देते हुए इसके प्रकारों का विस्तृत वर्णन कीजिए।
प्रश्न 2.
भौतिक एवं रासायनिक अपक्षय में अंतर स्पष्ट कीजिए।
प्रश्न 3.
रासायनिक अपक्षय की प्रमुख प्रक्रियाओं का वर्णन कीजिए।
प्रश्न 4.
अनाच्छादन से आप क्या समझते हैं? इसकी प्रमुख प्रक्रियाओं की व्याख्या कीजिए।
प्रश्न 5.
अपक्षय को नियंत्रित करने वाले प्रमुख कारकों की विवेचना कीजिए।
प्रश्न 6.
अपक्षय एवं अपरदन में अंतर स्पष्ट कीजिए।
प्रश्न 7.
“अपक्षय अनाच्छादन की आधारभूत प्रक्रिया है।” व्याख्या कीजिए।
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19. उत्तर लिखने की आदर्श रूपरेखा
परीक्षा में “Weathering and Denudation” पर 10–15 अंक का प्रश्न आए तो उत्तर इस क्रम में लिखें—
भूमिका
↓
अपक्षय की परिभाषा
↓
अपक्षय की विशेषताएँ
↓
भौतिक अपक्षय
↓
तापीय प्रसार → पाला क्रिया → लवण अपक्षय → दाब-मुक्ति → अपपत्रण
↓
रासायनिक अपक्षय
↓
विलयन → कार्बोनेशन → जलयोजन → ऑक्सीकरण → अपचयन
↓
जैविक अपक्षय
↓
अपक्षय को प्रभावित करने वाले कारक
↓
अनाच्छादन की अवधारणा
↓
अपक्षय → द्रव्यमान संचलन → अपरदन → परिवहन
↓
अपक्षय एवं अपरदन में अंतर
↓
भौगोलिक महत्व
↓
निष्कर्ष
---
20. निष्कर्ष
अपक्षय और अनाच्छादन पृथ्वी की सतह को निरंतर परिवर्तित करने वाली महत्वपूर्ण बहिर्जात भू-आकृतिक प्रक्रियाएँ हैं। अपक्षय चट्टानों को उनके मूल स्थान पर कमजोर, विखंडित या रासायनिक रूप से परिवर्तित करता है, जबकि अनाच्छादन की व्यापक प्रक्रियाएँ इन पदार्थों को हटाने, स्थानांतरित करने और स्थलरूपों के निम्नीकरण में योगदान देती हैं। इसलिए मृदा निर्माण, अपरदन, द्रव्यमान संचलन तथा स्थलरूप विकास को समझने के लिए अपक्षय एवं अनाच्छादन का अध्ययन अत्यंत आवश्यक है।
⭐ याद रखने की ट्रिक
अपक्षय के प्रकार:
भौतिक + रासायनिक + जैविक
रासायनिक अपक्षय:
वि–का–ज–ऑ–अ
विलयन → कार्बोनेशन → जलयोजन → ऑक्सीकरण → अपचयन
अनाच्छादन:
अपक्षय → द्रव्यमान संचलन → अपरदन → परिवहन
परीक्षा में सबसे महत्वपूर्ण
“अपक्षय = टूटना/विघटन, अपरदन = हटाना/परिवहन, अनाच्छादन = इन बहिर्जात प्रक्रियाओं का व्यापक समुच्चय।”
1. अनाच्छादन (Denudation)
"अनाच्छादन" का अर्थ है – पृथ्वी की सतह को ढकने वाली सभी ऊँचाईयों और असमानताओं को धीरे-धीरे हटाना।
यह एक सामूहिक प्रक्रिया (Composite Process) है जिसमें अपक्षय (Weathering), अपरदन (Erosion), निक्षेपण (Deposition) और जमाव (Mass Wasting) सब सम्मिलित होते हैं।
अनाच्छादन का परिणाम होता है – भूमि का समतलीकरण, ढाल का क्षरण और नए स्थलरूपों का निर्माण।
Denudation refers to the overall process of wearing away of the Earth’s surface and the removal of rocks and soil by various natural agents.
It is a collective term that includes weathering, erosion, transportation, mass wasting, and deposition.
The ultimate result of denudation is the gradual leveling of landforms and reduction of surface irregularities.
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2. अपक्षय (Weathering)
"अपक्षय" का अर्थ है – चट्टानों का टूटना या विघटन उनकी जगह पर ही (in-situ)।
इसमें चट्टानों को तोड़ा या बदला जाता है परंतु उनका स्थानांतरण (Transportation) नहीं होता।
अपक्षय के प्रकार:
1. भौतिक अपक्षय (Physical Weathering) – तापमान, हिमनद, पवन, जल आदि के कारण।
2. रासायनिक अपक्षय (Chemical Weathering) – जल, ऑक्सीजन, CO₂ आदि से रासायनिक क्रिया द्वारा।
3. जैविक अपक्षय (Biological Weathering) – पेड़-पौधे, जीव-जंतु, जीवाणु आदि के कारण।
Weathering means the disintegration or decomposition of rocks in situ (without movement).
It weakens rocks but does not transport the material.
Types of Weathering:
1. Physical Weathering – by temperature changes, frost action, wind, water, etc.
2. Chemical Weathering – by chemical reactions with water, oxygen, CO₂, etc.
3. Biological Weathering – by plants, animals, and microorganisms.
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3. अपरदन (Erosion)
"अपरदन" का अर्थ है – चट्टानों या मिट्टी का तोड़कर हटाना और उसका स्थानांतरण करना।
इसे करने वाले प्रमुख कारक हैं – नदी (River), हिमनद (Glacier), पवन (Wind), समुद्री तरंगें (Sea Waves) आदि।
अपरदन से घाटियाँ, कंदराएँ, जलोढ़ मैदान, डेल्टा आदि स्थलरूप बनते हैं।
Erosion is the process of wearing away, removal, and transportation of rock and soil materials from one place to another.
Main agents: Rivers, Glaciers, Wind, Sea Waves.
Landforms of erosion include valleys, canyons, flood plains, deltas, etc.
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संक्षेप में (In Short)
अनाच्छादन (Denudation): भूमि का समग्र क्षरण (समूह प्रक्रिया)।
अपक्षय (Weathering): चट्टानों का वहीं पर टूटना/विघटन, बिना स्थानांतरण।
अपरदन (Erosion): चट्टानों को तोड़ना + हटाना + एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाना।
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